Neeraj's poems

Saag

साग

अरे वाह, देखो!
क्या सज्जित भोजन की थाली है।
स्वर्ण सी मक्की की रोटी,
और यह हरी सब्जी क्या निराली है।

अतुल्य, असीमित आनंद का स्रोत,
यह छोटी सी थाली है।
भोज लगाओ और अनुभव करो,
जीवन की सब खुशियाँ जो पा ली हैं।

सामान्यता से परे यह सब्जी,
प्रेम रस की थाली है।
प्रेमिका ने बहुत प्रेम से,
अपने प्रेमी के लिए डाली है।

कितने परिश्रम से सरसों को काटा,
कितने धैर्य से उबाली है।
हरी सी यह सुन्दरता दर्शा,
क्या प्रेमिका के चहरे की लाली है !

ना भूलना इस प्रेम को,
ना वो प्रेमिका जो तुमने पा ली है,
ना करना तिरस्कार इस प्रसाद का,
कर दो साफ़ यह जो थाली है !

मेरी पहली रचना अपनी मात्रभाषा में :)

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